एक युवती बंजारन सी ,
दिल में उमंग ,मन में चंचलता और गलो पर लाली थी।
कपडे उसके गन्धे-संधे ,
एक हाथ में फुग्गे थे और दूजे में सुग्गा।
सूर्य की तपिश के कारण ,
कपड़े उसके भीग गए थे।
पर फिर भी उसको जाना था ,
उन टीन के डिब्बों के समीप।
रोज़ी-रोटी का एकमात्र साधन ,
उन टीन के डिब्बों से होता था।
सुग्गे और फुग्गे को बेचकर ,
वह सौदे को पटाती थी।
तो उनमे बैठे भेड़िये ,
ऐसे देखते जैसे हिरन को बाग़।
कभी वह उसकी छाती को देखते ,
कभी ऊपर से नीचे तक, जैसे कर रहे हो एक्सरा।
कभी उन गाड़ियों में शिक्षक होता ,
तो कभी विधार्थी।
कभी उनमे चौधरी होता ,
तो होता कभी ठाकुर।
कभी नेता ,
तो कभी वर्दी खाकी वाला।
एक और जन भी मौजूद था वहा ,
जो पीड़ा उसकी समझ गया था।
मन में तो वह पीड़ित था ,
पर बसमे उसके कुछ नहीं।
कुछ देर में लाल से हरी बत्ती हुई ,
तो गाड़ी सारी चल पड़ी।
उल्टी गिनती फिर शुरू हुई ,
और फिर से लाल बत्ती हुई।
रचनाकाल 2017
अरशद अंसारी
एम.ए हिंदी जामिआ मिल्लिया इस्लामिया
नई दिल्ली - 110025
पता - T-595, गली न-11, गौतमपुरी, नई सीलमपुर, दिल्ली - 110053
मोबाइल न- 8285947457
9811747289
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