उल्टा फ्लाईओवर
प्रवासी जो शहर में रोटी के खातिर आते थें ,
वह उल्टे फ्लाईओवर के नीचे बसेरा करते थें।
जब मैं रोज़ विश्वविद्यालय को जाता,
तो उन प्रवासियों को उसी स्थान पर पाता था।
उन्नति के खातिर,
वह फिर प्रवासी बन गए।
अब तो वहां फूलों के गुलदस्ते हैं,
सजावट में हरियाली हैं।
रोशनी इतनी हैं,
की एक ग़रीब को मयस्सर नहीं हैं।
कुछ फोलादों के जरिए,
फूलों को भी जकड़ रखा हैं।
उन फूलों के बीच में,
गाँधी का एक चरखा हैं।
जो ना कटता हैं ना बुनता हैं,
बस सौंदर्य का प्रतीक बना हैं।
बंदर भी है तीन बैठे,
वह भी हम जैसे ही हैं ।
आँख-मुँह-कान ऐसे पकड़े,
की सारा राज़ मन में जकड़े।
हम उनसे भी आला हैं,
नेत्र-जीभ-कन खुले होकर भी सुन्न पड़े।
अब ना वहा चहल-पहल होती हैं,
और ना ही आकृतियाँ गुमड़ती हैं।
अब तो बस वह स्थान सौंदर्य का प्रतीक हैं
जहाँ ना कोई जीव-जंतु भटकता हैं।
देखने पर वह स्थान सबके हृदय को भाता हैं,
इसी कारण उल्टा फ्लाईओवर भी सबको सीधा नज़र आता हैं।
2017
अरशद अंसारी
जामिआ मिल्लिया इस्लामिया
मोबाइल ना : 8285947457
2017
अरशद अंसारी
जामिआ मिल्लिया इस्लामिया
मोबाइल ना : 8285947457